Wednesday, January 11, 2017

पॉलिटिक्स समझ ना आयी

लिख रहा था कविता मैं,
किंतु मन में चिंता गहराई,
 देश समाज की फ़िक्र में,
 सारी उमर गंवाई। 

नेता लेकर निकले 
अपनी अपनी टोली, 
जैसे बच्चे गुट में फिरते हैं, 
जब आती है होली। 

इक ओर से मारे गए 
इलज़ामों के गुब्बारे, 
दूसरी ओर के 
जवाब भी थे करारे। 

जनता तैयार  थी लेकर
टिप्पणीयों के बाण, 
पर मीडिया के घूसख़ोरों ने
 भर दिए उसके कान।  

अखबारों  में  फिर 
जब छपा संपादकीय,
अकस्मात हो चला
 दूसरा दल सबको प्रिय। 

इस उथल पुथल को देख कर, 
कवि -अकल बलखायी 
नारी को समझना आसान लगा 
पर पॉलिटिक्स समझ  ना आयी।।

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