Monday, August 15, 2011

हैप्पी Independence डे


भारतवासियों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई
खूब उडाओ पतंग और खाओ मिठाई
सभी धर्म आपस में रहे खुश
और सभी बंधू जीवन में रहें संतुष्ट
कहे काबिल कवि संसार में न होगा ऐसा देश
जिसमे अनंत हैं रूप, रंग, भाषा और भेष....

Thursday, March 10, 2011

Facebook

facebook ऐ facebook ये तो बता,

बनते है दोस्त यहाँ पर क्या?

सब बनते है kool यहाँ,

बनाते हैं 'FRIENDS FOREVER'

But I ALWAYZ think if they ever had been together

और भी ख़ास बात है इस FB की.

हो जाते हैं सारे bro और dude

which alwayyzz frces me to act rude..

Pics करते हैं upload jst fr the sake of uploading

and करते हैं status update tht also jst fr the sake of updating...

करते हैं अपने ही mobile se apni foto click..tht too standing in front of mirror..

and कोई न कर पाए इस logic को clear..

पर इससे होते हैं दो फायदे which have actually no कायदे..

होता है mobile का show off..nd अपनी pik किचने का पूरा शौक...which actually makes me shocked!!..

ppl write on their walls.

i m sad..suffering from fever.as if evrybody in this world care..

करते हैं wait उन लोगों का..न करी कभी ज़िंदगी में जिनसे बात..

और नाही कर paayenge कभी ऐसे वार्तालाप...

have guts to talk on face nd not on Facebook...

इस fb कर दिया famous कुछ words को ..नहीं कछ लोगो को..

wassup...ahk..hiiiiiiiiiiiiiii...okzz...w8..ol9...

by the way...anwzz...its the source of my inspiration...

nd the way to shooww my stupid creation!


यह कविता हमारे ही एक श्रोता(रिषभ जैन) ने लिख कर अपनी काबिलियत पूरे भारतवर्ष के सामने ज़ाहिर की हैहम उसकी काबिलियत की सरहना एवं सम्मान करते हुए, यह कविता आप सबके सामने प्रस्तुत करते हैं

Thursday, January 20, 2011

जैसे को तैसा


पत्तों के सामने मुखौटा पड़ा था,
जंगल के किनारे बकरा खड़ा था।
नाज़ुक से धागे में एक नगीना जड़ा था,
जंगल में कहीं खज़ाना गढ़ा था।

जिसके पीछे एक कंगला लगा था,
कंगले को एक सेठ ने ठगा था।
जब वो जेल की चारदीवारी में जगा था,
सेठ भी भागते- भागते थका था,
तब वह अकस्मात् ही रुक कर खजाने का पता बका था।

मन ही मन लगा एक खयाली झटका,
जब वह अपनी राह से भटका।
मुखौटा उठा के तुरंत पटका,
जब उसे लगा काले जादू का फटका।


वहीँ उसने draw करी एक line,
और वापिस गया लेने खट्टा नीम्बू lime।
कंगले ने देखा सही टाइम,
और पहुँच गया खजाने को बनाने अपना।

सेठ ने नहीं दिया था पहरा,
तो कंगले ने खोद डाला गड्ढा दो गज गहरा।
उठा के खजाना भर लिया अपना गट्ठर,
और गड्ढे में भर कुछ पत्थर हो गया वहां से रफूचक्कर।

सेठ आया तो देखा खज़ाना हो गया था इधर- उधर,
और देख ये मंज़र उसके अरमान हुए तितर- बितर।
बकरे से पुछा - "Where is my treasure?"
पर बकरा था बहरा नहीं था उसका कुछ कहना।

सेठ आया तो था भरने अपना बोरा ,
पर छा गया उसके नयनों के आगे कोहरा।
सेठ हो गया sad,
इसलिए कहते हैं Tit for Tat।

Friday, January 14, 2011

डे dreaming


ओने डे इ ही ही ही
रिक्कू थिंक्स हे इस अ तरी
डे द्रेअमिंग वास नेवर सो फूं
ओने कोक्क काके
" cock-e-doodle-do"

Thursday, November 18, 2010

हाय! कवि को गम सताए

कविताएँ हुई कम
कवि को सताए ये गम
रात दिन कलम उठाये
घूमता है कवि हरदम

कविता में लिख डालूँ किसी का पता
या कह दूं एक बिल्ले की कथा
डालूँ किसी breadpakode में जान
इसी सोच में डूबा बैठा है कवि सदा

कहाँ गए वो श्रोता
कवि ने पाया अपने अन्दर एक सिक्का खोटा
सोच सोच के परेशान है कवि
की काश उसके के अन्दर कोई मस्त विचार होता

वहीँ उसने सामने देखा एक तोता
जीभ दिखा के बैठा था खिड़की पर मोटा
चिढ़ कर कवि ने उसको देखा
और फ़ैका उसपर एक लोटा

हँस कर बोला तोता
कविता के बिना कोई कवि नहीं होता
काबिल कवि को एक प्रेरणा मिली
और उसने फिर देवनागिरी में कविता लिखी

तोता और कवि गुनगुनाने लगे
और ठण्ड में गुनगुने पानी से नहाने लगे
तोता लोटे से और कवि श्री बिन लोटे के सुर लगाने लगे ...

Wednesday, June 16, 2010

श्रोता की व्यथा-कथा

साथ हमारे घट गयी फिर एक घटना नयी,
हमसे जब टकरा गए एक काबिल कवि.....

क्या कहें उनकी कविता थी, या था मदिरा का प्याला,
ओस की बूंदे थी, या धधकती हुई ज्वाला....

उनकी अभिव्यक्ति की शक्ति, उनकी शब्दों की भक्ति,
कर गयी हमारे मस्तिष्क की बत्ती गुल....उड़ गया तर्क
ऐसे जैसे खुले पिंजरे की बुलबुल...

इतने मगन होके कर रहे थे उनकी कविता का रसस्वादन,
कि अनुत्तरित रह गया हमारे तात का दूरभाष-अभिनन्दन...

जब हुआ तात से साक्षात आमना-सामना,
ऐसे कौंधी बिजली की गगन रहा गया सन्न,
उनके शब्द-बाणों की गर्जना से काँप गया अंतर-मन....

तात की कड़वी फ़टकार पड गयी कविता के वीर-रस पे भारी,
करनी पड़ी क्षमा-याचना हमें बारम-बारी...

काबिल कवि तो कविता कह के हो गए उड़न-छू,
और हम कभी उनकी कविता पे, कभी अपनी दुर्दशा पे
वाह-वाह कहते रह गए !

**यह कविता हमसे ग्रस्त एक श्रोता के द्वारा लिखी गयी है, हम इस रचना का सम्मान करते हैं, और अपने पाठक का आभार व्यक्त करते हैं

Saturday, June 12, 2010

The Honkers

tarr tarr tarr tarr
silly frog talks

टप टप टप टप
rain drops drop

sitting in his bed he was licking lollypops
then came papa frog to ask him to shop

papa said beta billy go and buy one dog
these days its not safe even with the lock

silly billy took umbrella and went to the market
that was when he realized there was no money in his pocket

while on the way to home he saw one duck,
his master was selling it for no buck

the duck was a penalty upon his master
as it talked a lot and compelled him to blaster

billy took the duck and brought it home
his father got angry and cracked his bone.

But silly billy had the duck
He used it as truck

In the traffic down the road they saw a biker
Duck quacked a lot, Billy said "tarr tarr".